Sunday, 5 July 2015

ग़ज़ल # 20

अज़नबी कौन, कौन अपना है।
अक़्स भी अब लगे पराया है।

तिश्नगी हर तरफ़ दिखाई दे,
जैसे हर घर में एक सहरा है।

खौफ़ अब है उसे सज़ा का क्या,
ज़ेब में बंद इक लिफ़ाफ़ा है।

इस क़दर दौड़ती दिखी सड़कें,
वक़्त से ज्यूँ मुक़ाबला सा है।

सुब्ह कटती है नींद में अक़्सर,
और रातों में दिन निकलता है।

ज़ह्र साँपों में भी नहीं उतना,
जितना इंसाँ ने ज़ह्र उगला है।

अब 'किरण' खौफ़ क्या सज़ा का भी,
ज़ेब में बंद इक लिफ़ाफ़ा है।
©विनीता सुराना 'किरण'

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