Thursday, 9 July 2015

ग़ज़ल # 21

कभी छुप के उसको निहारा बहुत है।

सितमगर है लेकिन वो प्यारा बहुत है।


हया से झुकी पलकें आहिस्ता उठना,

चुराने को दिल वो नज़ारा बहुत है।


सितम ज़ीस्त के सब कबूले ख़ुशी से,

यूँ अहसान उसका उतारा बहुत है।


सताया ख़ुदी को, था ग़ैरों को चाहा,

ख़ता को हमारी सुधारा बहुत है।


थी उनकी गुज़ारिश जुदा हो के जीयें,

'किरण' फिर भी दिल ने पुकारा बहुत है।


©विनीता सुराना 'किरण'

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