हमारी ये दुर्गत तो हरगिज़ न होती
अगर "वो" न होती, अगर "वो" न होती।
न बीवी की खिट-पिट न बेलन न सोटी,
अगर "वो" न होती, अगर "वो" न होती।
न कुत्ते गली के हमें यूँ भगाते,
भिखारी समझ कर न बच्चे सताते,
शरण लेते जब हम पड़ौसी के घर में,
न हूरों सी लगती पड़ौसन वो मोटी,
अगर "वो" न होती...
न काजू न भुजिया न सोड़ा न पानी,
न नख़रे दिखाती वो अंगूरी रानी,
उड़ाते चढ़ावा न मंदिर से छुपके,
न बच्चे नचाते हमें जैसे गोटी।
अगर "वो" न होती...
ख़ुमारी जो हम पर यूँ उसकी न चढ़ती,
हमें यूँ तो ज़िल्लत उठानी न पड़ती,
न बीवीे से घर का पता पूछते हम,
न झाड़ू से अपनी ठुकाई भी होती,
अगर "वो" न होती....
अभी और किस्से तुम्हें क्या बताएँ,
अभी और कितनी फज़ीहत कराएँ,
ज़ुबाँ को तुम्हारी भी सिलने की ख़ातिर,
तुम्हें भेंट "उसकी" चढ़ाई न होती,
अगर "वो" न होती...
©विनीता सुराना 'किरण'
No comments:
Post a Comment