Tuesday, 4 August 2015

ग़ज़ल#22

नफ़रतें कर लीं बहुत, थोड़ी मुहब्बत कर लें।
अब सुनें दिल की ज़रा, मुल्क़ ये जन्नत कर लें।

तोडना दिल तो किसी का, है बहुत आसाँ पर,
जोड़ पाएं जो मरासिम, ये रियाज़त* कर लें।
*प्रयास

वक़्त तो लेंगे ज़रा, ज़ख़्म बहुत हैं गहरे,
पर, नया ज़ख्म न हो, ऐसी तो सूरत कर लें।

मज़हबी रंग का जो, ज़ह्र भरा लोगों में,
उनसे कह दो कि अभी, और तिलावत* कर लें।
*धर्म ग्रन्थ को पढ़ना

यूँ शबे हिज़्र गुज़ारी है क़बाहत* में बहुत,
रौशनी लाई 'किरण', उससे रफ़ाक़त** कर लें।
*क़बाहत - कठिनता
**रफ़ाक़त- मैत्री
©विनीता सुराना 'किरण'

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