Wednesday, 5 August 2015

ग़ज़ल # 23

रात तनहा ही सही ख़्वाब सजा जाती है।
सुब्ह आती है मगर दर्द जगा जाती है।

याद है अब भी तेरा छोड़ के जाना मुझको,
वो बिछड़ने की घडी अब भी रुला जाती है।

बारिशों की वो मुलाक़ात भुलाऊँ कैसे,
अब भी बारिश वो छुअन याद दिला जाती है।

वक़्त ए रुख़सत जो जलाये थे सभी ख़त तेरे,
उनकी खुशबू में मेरी रूह नहा जाती है।

साथ हम जब थे 'किरण' ख़ूब सताया तूने,
याद भी तेरी वही रस्म निभा जाती है।
©विनीता सुराना 'किरण'

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