जिसे दिल ये चाहता है, वही काश मिल भी जाए।
न हो रात कोई तन्हा, न ये फ़ासला सताए।
न हो रात कोई तन्हा, न ये फ़ासला सताए।
वो ख़याल बन के महका, ये करम है उसका मुझ पर,
कभी लिख दूँ नज़्म उस पर, जोे फ़िज़ा भी गुनगुनाए।
कभी लिख दूँ नज़्म उस पर, जोे फ़िज़ा भी गुनगुनाए।
वो मुहब्बतें अधूरी, जिन्हें मिल सकी न मंज़िल,
कहीं दास्ताँ हमारी न उन्हीं में जुड़ने पाए।
कहीं दास्ताँ हमारी न उन्हीं में जुड़ने पाए।
ये सफ़र कटा भी यूँ तो, रहे हम सदा ही तन्हा,
बनी याद उसकी साथी, कभी साथ वो भी आए।
बनी याद उसकी साथी, कभी साथ वो भी आए।
ये 'किरण' का ही है जज़्बा, कि न हारी रात से भी,
हुई गुम भी तीरगी जब, नई सुब्ह मुस्कुराए।
©विनीता सुराना 'किरण'
हुई गुम भी तीरगी जब, नई सुब्ह मुस्कुराए।
©विनीता सुराना 'किरण'
bahut achha varnan h. . . .milan or intzaar ka :)
ReplyDeleteThanks a lot Puru 😊
ReplyDelete