खिल उठा आँगन मे'रा जब, आई' तू नन्ही परी।
तेरे' आने से ही' बगिया, अब लगे मेरी हरी।
फूल सी कोमल व नाज़ुक बूँद है तू ओस की,
वक़्त की हर चोट से, पर तू बने फौलाद सी।
थाम कर मैं हाथ तेरा, चल न पाऊँ उम्र भर,
पर दुआएं साथ होंगी, तू रहे चाहे जिधर ।
ये चमन है ख़ूबसूरत, खिलखिलाना तू सदा,
पर नहीं डरना, मिले जो राह काँटों से भरी।
खिल उठा आँगन ....
तू नहीं निर्बल, सहारा बन सदा तू और का,
चाँदनी सा रूप है पर तेज़ रखना सौर का।
प्रीत से मन हो भरा पर वार को सहना नहीं,
तोड़ देना हाथ जो अपमान तेरा हो कहीं।
तू बने रक्षक स्वयं, मेरा यही अरमान है,
स्वाभिमानी बन के' जीना, क्यों रहे अब तू डरी।
खिल उठा आँगन....
बुन हसीं तू ख़्वाब बिटिया, चुन ले'अपना आसमाँ,
तू उड़े निर्भीक होकर, छोड़ती जाए निशाँ।
तू 'किरण' है भोर की, हो रोशनी जाए जहाँ,
हौसलों से रात को भी मात देना तू वहाँ।
तुझमें' छवि अपनी दिखे, है मान तू अभिमान तू,
तू खरा सोना, उतरना हर कसौटी पर खरी।
खिल उठा आँगन....
©विनीता सुराना 'किरण'
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