किस राह चल पड़ा है ये दिल ढूँढता किसे।
नादान ! चाहने से कहाँ सब मिला किसे।
ग़ाफ़िल था दिल रुका ही नहीं रोकने से भी,
ऐसी थी बेख़ुदी कि कहाँ होश था किसे।
क्यूँ नाम दिल्लगी का दिया, ख़ुद को दी सज़ा,
इल्ज़ाम किस पे और कहें अब ख़ता किसे।
गुस्ताख़ चश्म ने ही सजाए थे ख़्वाब पर,
मज़बूर दिल हुआ तो कहे बेहया किसे।
आदत थी तीरगी की हमें, क्यूँ दी रौशनी,
चुभती रही 'किरण' भी ये कहते भला किसे।
©विनीता सुराना 'किरण'
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