Tuesday, 29 December 2015

ग़ज़ल # 27

तीरगी में ज़िया के जैसा है।
उसका मिलना दुआ के जैसा है।

इश्क़ उससे, ख़ता के जैसा है।
हाँ, मगर वो ख़ुदा के जैसा है।

आशना है वो रूह से मेरी,
रुहअफ़ज़ा, ग़िज़ा के जैसा है।

अब न परवाह ज़ख़्म की कोई,
दर्द में वो दवा के जैसा है।

हो करम इतना लौट आए वो,
उसका जाना सज़ा के जैसा है।

है तज़ल्ज़ुल ये ज़िन्दगी मेरी,
पुरसुकूं वो शफ़ा के जैसा है।

बारहा धूप से जली है 'किरण',
वो तपिश में सबा के जैसा है।

©विनीता सुराना 'किरण'
*ज़िया - रौशनी
*आशना - मित्रता
*रुहअफ़ज़ा - जीवन बढाने वाला 
*गिज़ा - ख़ुराक
*तज़ल्ज़ुल - ज़लज़ला, अस्थिरता
*शफ़ा - किनारा
*सबा - हवा

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