Monday, 11 January 2016

ग़ज़ल #28

क्या मिला, क्या खो दिया, कैसे कहें।
ज़िन्दगी का क्या सिला, कैसे कहें।

दर्दे- दिल और आँसुओं से क्या गिला,
साथ इनका क्यूँ मिला, कैसे कहें।

राह तकते उम्र बीती है मगर,
वो नहीं आ पाएगा, कैसे कहें।

आख़िरी क़दमों की थी कुछ दूरियाँ,
तय न होगा फ़ासला, कैसे कहें।

इश्क़, चाहत या मुहब्बत नाम दो,
दर्द के सब रहनुमा, कैसे कहें।

रास जिनको आ गयी है तीरगी,
और को, अब  बेवफ़ा, कैसे कहें।

अर्ज़ियाँ खुशियों को भेजी थी  'किरण'
खो गया ख़ुद का पता , कैसे कहें।
©विनीता सुराना 'किरण'

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