Friday, 29 January 2016

ग़ज़ल # 29

अज़ब सा फ़साना ये क्या हो गया है।
कभी था जो साया, जुदा हो गया है।

यकीं जिन पे हमको था जां से ज़ियादा,
उन्हें क्यूँ हमी पर शुबा हो गया है।

दुआओं में माँगा उन्हें हमने रब से,
मग़र साथ उनका सज़ा हो गया है।

कभी ज़िन्दगी के लिए था जरुरी,
वही ज़िन्दगी की ख़ता हो गया है।

सहर में 'किरण' खो गयी, नासमझ थी
समझ ही न पायी दगा हो गया है।
©विनीता सुराना 'किरण'

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