Thursday, 4 February 2016

गीत

आवारा सा, बंजारा सा,
उड़ता-फिरता था मेरा मन ।
चाहे रुकना, चाहे थमना,
अनजाना सा कैसा बंधन ।

रिमझिम बरसे यादें तेरी,
भीगी-भीगी चुनरी मेरी।
साँसों में कैसी ये ज़ुम्बिश,
मन करता मिलने की ख़्वाहिश।
कैसी साज़िश क़ुदरत ने की,
बदली-बदली लगती धड़कन।
चाहे रुकना, चाहे ....

मन किसको अब अपना माने,
रब क्या चाहे, रब ही जाने।
उसकी मर्ज़ी मिलना अपना,
फ़िर भी लगता जैसे सपना।
कैसी दूरी, क्या मज़बूरी,
कैसी रूहों की ये तड़पन।
चाहे रुकना, चाहे ....

क्या खोया है, क्या है पाया,
साथ कहाँ कुछ लेकर आया।
कौन करे ये लेखा-जोखा,
दुनिया तो बस है इक धोखा।
हर पल जी लो, जी भर जी लो,
चार पलों का है बस जीवन।
चाहे रुकना, चाहे ...
-विनीता सुराना 'किरण'

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