हर क़दम छलती रही ये ज़िन्दगी।
दर्द दे हँसती रही ये ज़िन्दगी।
ख़्वाब जो सुलगे हसीं उस रात में,
सुब्ह तक जलती रही ये ज़िन्दगी।
किर्चियाँ कितनी संभाले, हर कहीं,
टूट कर गिरती रही ये ज़िन्दगी।
हँस रहे थे लब, नमी थी आँख में,
ख़ुश हैं हम, कहती रही ये ज़िन्दगी।
तल्खियाँ दिल में छुपाये हम रहे,
तंज़ पर, कसती रही ये ज़िन्दगी।
सब्र कितना और रक्खे अब 'किरण'
वार सौ करती रही ये ज़िन्दगी।
©विनीता सुराना 'किरण'
No comments:
Post a Comment