कहीं यादों में भी ज़िंदा, कहीं तिल-तिल मरे रिश्ते।
कभी ठहरे थके से ये, कभी मीलों चले रिश्ते।
कभी है ज़र्द पत्तों से, कभी फूलों से महके हैं,
बदलते वक़्त के हाथों बदलते ही रहे रिश्ते।
दिलों में दूरियाँ हो तो ये अश्क़ों में डूबाते हैं,
मगर विश्वास हो दिल में बनाते पुल नए रिश्ते।
सुकूँ देते ये शबनम से, कभी मरहम से लगते हैं,
अगर दे ज़ख्म अपने ही तो शूलों से चुभे रिश्ते।
तिमिर की आहटों से जब सहम जाता कभी ये दिल,
किरण से तब दमकते हैं, लगे सूरज से ये रिश्ते ।
©विनीता सुराना 'किरण'
No comments:
Post a Comment