Thursday, 25 February 2016

ग़ज़ल #32


प्यार नहीं वो ख़ार चुनेंगे।

सँगदिल बस प्रतिकार चुनेंगे।

उन्हें मुबारक़ नफ़रत उनकी,
उल्फ़त हम हर बार चुनेंगे।

जिनकी फ़ितरत ज़ह्र उगलना,
वो कब रस की धार चुनेंगे।

अल्फ़ाज़ बहुत है यारों, हम
इश्क़, मुहब्बत प्यार चुनेंगे।

धान भरा हो खलिहानों में,
फंदा क्यूँ बेकार चुनेंगे।

ज़ुल्म सहेंगे कब तक आख़िर,
वो ख़ंजर हथियार चुनेंगे।

सच का नशा हो तारी जिन पर,
फ़ूल नहीं अंगार चुनेंगे।

भूलेगा औक़ात पड़ौसी,
हार नहीं फ़िर वार चुनेंगे।

'किरण' सहर को रोशन करती,
जुगनू पर अंधियार चुनेंगे।

©विनीता सुराना 'किरण'

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