जो समझे तो इतना इशारा बहुत है।
तेरा नाम लिख कर मिटाया बहुत है।
खिलौना नहीं दिल जो तोहफ़े में दे दें,
बलाओं से इसको बचाया बहुत है।
ये माना है इज़हार दस्तूर-ए-उल्फ़त,
ज़रा सुन कि दिल ने पुकारा बहुत है।
ज़ुबाँ पर थे ताले हया के पड़े पर,
नज़र यूँ बचा के निहारा बहुत है।
ख़ुशी से मुलाक़ात होती नहीं पर,
दिखाने को अक़्सर वो हँसता बहुत है।
लबों पर शिक़ायत वो लाता नहीं पर,
नमी चश्म की वो छुपाता बहुत है।
सहर तक सफ़र था 'किरण' यूँ तो तन्हा,
मगर शब का आना डराता बहुत है।
©विनीता सुराना 'किरण'
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