सिलसिले थे चाहतों के, दिल रहा फ़िर भी डरा।
सींचते ग़म से रहे, वो ज़ख़्म गहरा कब भरा।
फ़िर मुहब्बत ने लिखे ख़त, दिल तलक पहुँचें नहीं,
ज़िन्दगी देती रही दस्तक मगर तुम गुम कहीं।
हाँ रिहाई दर्द से मिल जाएगी उस पल तुम्हें,
दर्द की आँखों में आँखें डाल कर देखो ज़रा।
सिलसिले थे ...
हक़ सभी थे पास पर तुमने उन्हें जाना कहाँ,
फ़र्ज़ को बेड़ी बनाया, भूल कर ख़ुद को यहाँ।
जान लो, पहचान लो, हाँ ख़ुद को अपना मान लो,
तुम नहीं कमतर किसी से, सौ टका सोना खरा।
सिलसिले थे....
©विनीता सुराना 'किरण'
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