Friday, 18 March 2016

ग़ज़ल # 34

शाम ढले फिर मिलने आई ख़ामोशी।
मेहमाँ थी फिर भी इतराई ख़ामोशी।

कितना चाहा दूर रहे कब मानी ये,
चुपके से मन में गहराई ख़ामोशी।

हलचल की यादों ने सूने से मन में,
हौले-हौले फिर लहराई ख़ामोशी।

मेले लगते हैं अहसासों के यूँ तो,
अल्फ़ाज़ उन्हें कब दे पाई ख़ामोशी।

ख़्वाबों में जब-जब आता है वो मिलने,
तब-तब लगती है शहनाई ख़ामोशी।

उसके ख़्यालों से महके तन्हा लम्हें,
और गुलाबों सी मुस्काई ख़ामोशी।

लब पर नाम 'किरण'आये जब भी उसका,
बन के रुबाई ले अँगड़ाई ख़ामोशी।
©विनीता सुराना 'किरण'

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