Saturday, 26 March 2016

ग़ज़ल # 35

दर्द दो, अश्क़ दो, छुपाएंगे।
हम वफ़ा तुमसे यूँ निभाएंगे।

ख़ुश हो गर हमसे तुम जुदा होके,
ख़ुश हैं हम भी यही जताएंगे।

हाँ गुज़र जाएंगे ये लम्हें भी,
पर निशाँ कुछ तो छोड़ जाएंगे

वज़ह ढूँढोगे मुस्कुराने की,
हम तुम्हें ख़ुद ही याद आएंगे।

दिल है गर आशना समझ लेगा,
बात जो लब से कह न पाएंगे।

ये दुआ करना तुम मिलो न हमें,
तुमको तुमसे ही हम चुराएंगे।

गर तुम्हें चाहना ख़ता है 'किरण',
ये ख़ता फिर से दोहराएंगे ।

विनीता सुराना 'किरण'

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