Sunday, 13 November 2016

ग़ज़ल # 55

कस्र भी हो मगर इक सहारा मिले।
कब कहा हमने सारा ज़माना मिले।

ग़म मेरा आसमाँ हो न जाए कहीं,
अब ख़ुशी का भी कोई बहाना मिले।

ख़्वाब तो देख लें पर रखेंगे कहाँ,
पहले अश्कों को तो इक ठिकाना मिले।

हो मुक़म्मल नहीं तो अधूरी सही,
फिर किसी मोड़ पर वो तमन्ना मिले।

बुत बनाकर इबादत करेंगे 'किरण'
कोई तुम में भी हम सा दिवाना मिले।
©विनीता सुराणा किरण

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