Friday, 18 November 2016

ग़ज़ल # 56


उनके लहज़े में तल्खियाँ भी थी।
पर मुहब्बत की झलकियाँ भी थी।

बारिशें तो सुकूँ ही लायीं मगर,
साथ यादों की बिजलियाँ भी थी।

चाहतें थी तो फिर गयीं वो कहाँ,
कुछ तो दोनों की गलतियाँ भी थी।

सुर्ख़ आँखों में तबस्सुम ही नहीं,
अनकही सी कहानियाँ भी थी।

कुछ तो बाग़ी थे हम 'किरण' लेकिन,
कुछ ज़माने की सख्तियाँ भी थी।

©विनीता सुराणा किरण

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