Saturday, 18 March 2017

ग़ज़ल # 57

जाने कितने सवाल करते हो।
क्यूँ बुरा अपना हाल करते हो ?

उस पे उम्मीद है वफ़ा की तुम्हें,
बाख़ुदा क्या बवाल करते हो।

रूठ जाऊँ तो मुस्कुरा देते,
ये ख़ता भी कमाल करते हो।

रंग भरते हो अनगिनत मुझमें,
मुझको यूँ बेमिसाल करते हो।

बिन इजाज़त चले भी आए, अब
ख़्वाब में भी धमाल करते हो ।

दूर हो, दूर ही रहो मुझसे,
मिल के जीना मुहाल करते हो।

कहते हो हक़ नहीं 'किरण' तुम पर,
फिर क्यूँ इतना ख़्याल करते हो?

©विनीता सुराना किरण

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