मुहब्बत से दामन बचाते नहीं हैं।
मगर हर कहीं दिल लगाते नहीं हैं
मगर हर कहीं दिल लगाते नहीं हैं
है तासीर गर तो ये पहुँचेगी तुम तक,
मुहब्बत को हम यूँ जताते नहीं हैं।
मुहब्बत को हम यूँ जताते नहीं हैं।
चलो कर ही लें इक मुलाक़ात अब तो,
वगरना कहोगे, बुलाते नहीं हैं।
वगरना कहोगे, बुलाते नहीं हैं।
ज़ुबाँ से न बोलो, तो आँखों से कह दो,
यूँ ख़ामोश रहकर सताते नहीं हैं।
यूँ ख़ामोश रहकर सताते नहीं हैं।
वसीयत में दिल लिख दिया नाम तेरे,
लिखा तो लिखा, अब मिटाते नहीं है।
लिखा तो लिखा, अब मिटाते नहीं है।
चले आए आँसू ये बैरंग खत से,
पता भी ये अपना बताते नहीं हैं।
पता भी ये अपना बताते नहीं हैं।
अगर दोस्त हो जान भी हम लुटा दें ,
अना को मगर हम गिराते नहीं हैं ।
गर शम्स तुम हो किरण मैं तुम्हारी,
यूँ साये से पीछा छुड़ाते नहीं हैं।
©विनीता सुराणा किरण
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