Saturday, 30 July 2016

ग़ज़ल# 47


जी तो ली ये ज़िन्दगी तेरे बिना।
उम्र सदियों सी कटी तेरे बिना।

है तपिश यादों की हर इक सांस में,
शाम सुलगी सी लगी तेरे बिना।

ख़्वाब सारे कह गये थे अलविदा,
नींद भी रूठी रही तेरे बिना।

गम तो सारे बन गए हमदम मगर,
हर ख़ुशी है मुल्तवी तेरे बिना।

हिज़्र की वो रात लंबी थी 'किरण'
सुब्ह भी तन्हा मिली तेरे बिना।
©विनीता सुराणा 'किरण'

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