Monday, 15 August 2016

ग़ज़ल # 48

हर सु देखी साज़िशें।
क़त्ल होती ख़्वाहिशें।

सादगी है अब कहाँ,
हो रही नुमाइशें।

बरसे कब ये पूछ कर,
अश्क़ हो या बारिशें।

इक तेरा ख़्याल बस,
साँसों में हैं ज़ुम्बिशें।

शोख़ मन ये, उड़ चला
तोड़ सारी बंदिशें।

अपनों का जो साथ हो,
क्या बिगाड़े गर्दिशें।

बुझ न पाएगी 'किरण',
चाहे कर ले कोशिशें।
©विनिता सुराणा 'किरण'

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