Wednesday, 5 October 2016

ग़ज़ल # 50

इक मुलाक़ात तो वो करें कम से कम।
दिल की बातें न दिल में रखें कम से कम।

मसअला कोई भी हो, सुलझ जाएगा।
इक सिरा तो पकड़ कर चलें कम से कम।

दूर हो पास हो ये अलग बात है,
दिल में महफ़ूज़ यादें रहें कम से कम।

माँगने की तो आदत नहीं है हमें,
पर कभी कोई तोहफ़ा तो दें कम से कम।

एक अरसा हुआ गुफ़्तगू भी नहीं,
पर 'किरण' वो पुकारा करें कम से कम ।
©विनीता सुराना किरण

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