सफ़र ज़िन्दगी का रुका भी नहीं है।
मगर फ़ासले पर कज़ा भी नहीं है।
मगर फ़ासले पर कज़ा भी नहीं है।
ज़ुबाँ पर न आया था लफ़्ज़-ए-मुहब्बत
मगर राज़-ए-उल्फ़त छुपा भी नहीं है।
मगर राज़-ए-उल्फ़त छुपा भी नहीं है।
निभाते हैं हम दोस्ती दोस्तो से,
जो बिगड़े तो हम से बुरा भी नहीं है।
जो बिगड़े तो हम से बुरा भी नहीं है।
गुज़ारिश थी दिल की, उन्हें भूल जाएं,
मगर ख़ुद उन्हें भूलता भी नहीं है।
मगर ख़ुद उन्हें भूलता भी नहीं है।
वो साया तो है पर नहीं है वो साथी,
कोई इससे बढ़कर सज़ा भी नहीं है।
कोई इससे बढ़कर सज़ा भी नहीं है।
शबे वस्ल थी पर सहर हिज़्र लायी,
'किरण' वो मिला पर मिला भी नहीं है।
'किरण' वो मिला पर मिला भी नहीं है।
©विनीता सुराना 'किरण'
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